घोटालों की जड़?

आजकल मेरे सभी बुद्धिजीवी मित्रो, अग्रजों के वाल पर व्यापम की चर्चा है, सबके अपने अपने आंकड़े तथ्य व् तर्क है जो वाक़ई हमे जानना चाहिए… ललित गेट के बाद कांग्रेस व्यापम व्यापम चिल्लाना शुरू कर चुकी है पर पूरा यकीन है ललित मोदी कांड की तरह ही जैसे ही इसके जड़ में कोई कांग्रेसी आएगा ये पुनः गांधी के बन्दर बन जायेंगे…वैसे मैं मेरे दोस्तों से पूछना चाहता हु की कहीं गब्बर इज़ बैक तो नहीं 😉 अगर नहीं है तो क्यों नहीं एक गब्बर पर्दे से बाहर उतार ले, हर बार नई पार्टी क्यों, मोमबत्ती क्यों, भगत सिंह का फ़ोटो लेकर हज़ारो की भीड़ तो खड़ी हो जाती है पर भगत सिंह सरीखे देशप्रेमी के नाम की भीड़ इतनी लाचार? और चुप्पी वाला आंदोलन क्यों?? 70 साल होने को है, लोगों ने हर बार नेताओं को दोष देकर खुद को साफ़ कह दिया पर क्या हम वाक़ई आजाद हुए?? आज भी हमें कोई मोमबत्ती पकड़ा के सच्चा समाज हितैषी कहा जाता है, कुत्तों को जैसे रोटिया फ़ेंक वफादार बनाया जाता है ठीक उसी प्रकार कोई हमें मुफ़्त बिजली तो कोई मुफ़्त रोटी तो कोई मुफ़्त टीवी तो कोई आरक्षण की बोटी सुंघा हमारे स्वाभिमान को हर लेता है, और हम हमारे बेइज्जती को एक तमगा समझ दिखाए फिरते है… आजादी के बाद जिस देश को स्वाभिमानी होना था वो आरक्षण के चूल्हे पे चढ़ाया गया, जिस राष्ट्र को धर्म के आधार पे बांटा गया उसे सेक्युलर की संज्ञा देकर क्यों गुमराह किया गया? आज जो भी घोटाले होते है उसमे कोई व्यक्ति, पार्टी अकेले दोषी नहीं है बल्कि हम सब, हमारा समाज दोषी है जो हर मौसम एक नए चूतिये पर यकीन कर लेता है जो मौसम बदलते ही बदल जाता है.. आजादी बाद राष्ट्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले देशभक्त ऊँगली पर गिने जा सकते है पर कहानियां इतनी गढ़ ली है की हर साल भारत रत्न, पदम् भूषण, विभूषण और न जाने कौन कौन इनाम बंट रहे पर ये वो लोग है जिनकी चर्चा और योगदान दोनों ही उन चोरो से कम होती है जो कभी चारा तो कभी ताबूत तो कभी कोयला और न जाने क्या क्या घोटाला करते आये और बाबजूद इसके  इन घोटालेबाजों को कुत्ते(बोटी के लोभी चमचे) मिल जाते है, चोरो की मौत पे रोने वाले रुदाली मिल जाते है पर भगत सिंह की झलक नहीं मिलती, ये आजाद ख्याल है या कुछ और?? अब तो सच्ची सिनेमाई पर्दे के कुछ गब्बर जैसे चरित्र रियल जिंदगी में उतरने चाहिए ताकि ये हर मौसम वही कहानी वाला दृश्य खत्म हो जिसमे घटना दुहराई जाती है बस चेहरा और चरित्र बदल जाता है।

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3 thoughts on “घोटालों की जड़?

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    1. गुस्सा आता है, आजादी बाद jp आंदोलन से लालू तो लोकपाल के आंदोलन से केजरी निकले और सब ने लोगों को स्वाभिमान बेचना सिखाया 😦

      1. Gussa swabhavik hai aur ise palate rahana tabhi khuchh hal bhi nikalega. Logon ko gussa nahi aata sab sahane ki aadat ne hi to gulam banaya par jab tak khud par na beete log gussa hi nahi hote.

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