उनको नहीं नसीब काबा-काशी

ये उन महामुर्खाधिराजों के लिए समर्पित जो आये दिन उपरवाले की खिदमत में निचे वालों का जीना दुरूह करते है, जो कभी ताज पर हमला करते है, जो कभी म्यांमार में नर संहार करते है, जो कभी सीरिया, इराक, यजीदी में धर्म के नाम पर खुलेआम रक्तपात करते है.. पढ़िए शेयर कीजिये और नफरत की आग में थोडा सा आलोचनाओं का पानी डालिए..

उपरवाले की चाह में वो इतना गिरा कि बेवक्त उसका जनाजा उठा,
उसे चाह थी रसूल के खिदमत की, पर उसको शैतानो ने फांसा बड़ा,
अक्ल उसमें तो शायद था ही नहीं, बन दुश्मन मानवता का चढ़ गया वो बली,
वायदा-ए-आका की कहलायेगा गाजी, आस उसकी ये आखिर रह गयी अधूरी,
हुयी थू-थू तब उसके नाम-घर-बाप की, हराम था वो जो कल चढ़ा था फांसी,
अब और ना खेले शैतान धर्म की राजनीती, जो मारते हो निर्दोष नही होते काजी,
जिस दिल में पलता हो नफरत भाड़ी, उनको नहीं नसीब काबा-काशी..
-सन्नी कुमार

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