तुझे याद करते-करते ग़ज़ल मैं लिखूँ

हृदयानुभूति

तुझे याद करते -करते कोई ग़ज़ल मैं लिखूँ
तेरे साथ गुज़रा लम्हा हर एक पल मैं लिखूँ.

ये दौर किस तरह का,कौन बताएगा यहाँ
हर शख्स की बदलती हुई शकल मैं लिखूँ।

इक रोज़ तो मिला था वो आप ही खुद से
उस रोज़ को खोजकर फिर धवल मैं लिखूँ।

मजहब तो कहता प्यार कर पर सुने है कौन
इस प्यार की बात पर कुछ नवल मैं लिखूँ।

तेरी याद जब भी आए भीग जाएँ मेरी ग़ज़लें,
ज़माने से छुपाने को संभल-संभल मैं लिखूँ।

View original post

2 thoughts on “तुझे याद करते-करते ग़ज़ल मैं लिखूँ

Add yours

Feedback Please :)

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: