एक सिक्के की आस में

 

helpless

एक सिक्के की आस में,
कब से भटक रहा है वो,
सिग्नल की बत्ती लाल देख,
गाडियों पे है झपट रहा वो,
मांग रहा हर एक से सिक्का,
लगाये हुए वो आस..

कुछ उससे नज़रे चुरा रहे,
कुछ अपनी मजबूरी जता रहे,
आसानी से मिलता कहाँ सिक्का,
जिसकी उसे तलाश..
यह एहसास उसे भी है,
फिर भी कर रहा प्रयास..

जा रहा हर एक के पास,
अपनी मज़बूरी लिए हुए,
पसीज जा रहा जिनका सीना,
वो दे देते उसे सिक्का अपना,
कुछ बेगैरत ऐसे भी है,
जो बेचारे को डांट लगाते,
चोर-चकार की संज्ञा देकर,
दूर से ही उसे भागते.

उस बदनसीब की नसीब कहाँ
की कोई उसको प्यार दे,
उसको तो इतना भी न पता,
मातृ छाया होता है क्या??

माँ और माँ की प्यार का तरसा,
तरस रहा है सिक्को को,
सिक्को से ही उसे रोटी है मिलनी,
और सिक्को से प्यार..

उसकी ये दुर्दशा देख,
उठते कई सवाल|
उसकी बेवसी क्या है ऐसी?
जो फैला रहा वो हाथ|
होने थे जिस हाथ किताबें,
क्यूं उनको सिक्को की डरकर?

बच्चे ही भविष्य हमारा,
हम सब ये जानते है,
फिर भविष्य का वर्तमान ऐसा,
क्यूं इसे ऐसे स्वीकारते है?
ये कैसी है समस्या,
जिसे हम, सुलझा नहीं पाए??

 

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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